Sunday, September 2, 2007

मेरी डायरी से

१. हमारी हर कोशिश में एक कशिश थी
वो बात दिल्लगी नहीं, दिल की लगी थी

२. नादानी में हम भी पेजर खरीद लाए,
जर-जरित हो गए, जब घर से बुलावे आये

3. अक्सर ऐसा होता है कि हम चाह कर भी
नहीं चाह पाते उनको जो हमे चाहते है


४.हमे अपनी तकदीर पर भरोसा था, खुद पर नहीं
,

इसलिये तो आजमाया तुम्हें, अपने आप को नहीं