Monday, September 3, 2007

पुकार

हे मानुष, तू किसे पुकारता,
तू झुलसता जा , करहाता जा, झुकता जा,
पर कौन सुन रहा है तेरी पुकार,
कैसे करेगा तू अपने काम साकार,
कैसे देगा तू अपने सपनो को आकार,
तू जो तूफानों को करना चाहता था पार,
पर यह कैसे है मंझधार
अमीर गरीब सब चिन्ता में है डूब,
वाह कुदरत तेरी नीति है ख़ूब,
हे मानुष, तू किसे पुकारता

पुकारना है तो पुकार अपने श्रम को, अपनी शक्ति को,
अपनी सोई हुई संवेदना को जगा,
हाय हाय की रट को मिटा,
अपने कर्त्तव्य को सीने से लगा,
फिर पायेगा तू वो सब, जो तुझे पाना है,
दृर्ढ़ कर तुझे खाली हाथ नहीं जाना है,
तुझे अपना नाम रक्त के कणों से,
धरती पर नहीं, बादलों में लिख जाना है,
यहीं है आज, जमाने की पुकार,
देश की पुकार, और यहीं होनी चाहिए,
तेरी अपनी पुकार

- December '94