Sunday, August 12, 2007

दो शब्द

परिस्थितीयों कि ढाल में ढल गए हम, ऐसा क्या हुआ की बदल गए हम

बस यू ही

कुछ उलझी कुछ सुलझी हुई सी जिन्दगी,
रात के अँधेरे में करहाती हुई सी जिन्दगी,
कुछ रुलाति कुछ हंसाती हुई सी जिन्दगी,
भोर की हर किरण के साथ बदलती हुई सी जिन्दगी

कभी रुकी कभी भागति हुई सी जिन्दगी,
हमेशा कुछ तलाशती हुई सी जिन्दगी,
कुछ देती कुछ छिनती हुई सी जिन्दगी,
रात की करवट में समाई हुई सी जिन्दगी,

कुछ लोगों से बनती कुछ से बिगड़ती हुई सी जिन्दगी,
हर बदलाव को समेंटती हुई सी जिन्दगी,
अपने दर्द को सीने में दबा कर,
कई दास्ताँ सुनाती हुई सी जिन्दगी,

कुछ सवाल कुछ ज़वाब देती हुई सी जिन्दगी,
बस क्षितिज पर चलती हुई सी जिन्दगी